पार्थ या कर्ण?

"हरी के सम्मुख भी ना हर जिसकी निष्ठा ने मानी

धन्य - धन्य! राधेय बंधुता के अद्भुत अभिमानी"


भगवान उवाच -

"रुके क्यों हो पार्थ उठाओ गांडीव और सर भेद दो इस अतुल धनुर्धर का।"

-"परन्तु गोविंद यह तो अधर्म है । कर्ण निहत्था है और मेरा उस पर वार करना क्षत्रियता के खिलाफ है।"

"मरा तो अभिमन्यु भी अधर्म से ही था, और तुम धर्म की बात दुर्योधन की सेना से कर रहे हो?"

अर्जुन की गांडीव आज फूले ना समा रही होगी।शायद कर्ण की काया ही उसका अंतिम स्वप्न होगा जो आज संपन्न हुआ। शायद सूर्य भी सरकर घन में छीप गए होंगे । शायद महाराज श्री कृष्ण मन में स्वयं विलाप कर रहे होंगे।शायद दुर्योधन के अश्रु भी निकले होंगे । शायद धर्मराज निष्ठा की सम्मान कर रही होंगे।

भू का विजेता मिट्टी छोड़ चुका है,अब कौन उन सूत पुत्रो को समाज में सम्मान दिलवाएगा , कौन दीनो का स्वामी बनेगा,कौन दान~धर्म का अभिमानी बनेगा ,कौन प्रण के पालन हेतु प्राण देगा,भला कौन अपना कवच और कुंडल देगा?

क्या छल से उस वीर को मारा जाना सही है ? जिसने कुटिल समाज के विष को पिया,जिसने अपने वचन के लिए दिनमणि का आशीर्वाद त्याग दिया, जिसने निष्पक्षता के लिए भुज के अलावा किसी का सहारा न लिया ,जिसने बंधूता के लिए गोविंद की घूस त्याग दी,क्या उस वीर अभिमानी का छल से मरना सही है?

मही का सिंगार था कर्ण । इस प्रकृति के अलावा किसने सहारा दिया था उसे । पर आखिर में उसी मही की मिट्टी ने क्यों किया उस तेज प्रतापी के साथ विश्वासघात?अनोखा नियम है प्रकृति का दानवीर की दीनता को यह फल मिला।

सच ही अनोखा मनुज होगा कर्ण , जो खीच लाया स्वयं स्वर्ग को मिट्टी पर वो भी सिर्फ कवच और कुंडल की भीख के लिए।

अहा! क्या उदार होगा वह, हस के दे दिया जिसने, वह जो था वर्षों से उसके सीने में।

विचारिए उसके प्रताप को ज़रा,नर और नारायण का साथ ही जिसे रोक पाया ।

विडंबना है यह कि अनुज ने अग्रज को हराया । जीत अर्जुन की हुई पर रण में माता कुंती ही हारी।

दो तनय थे सुयोधन के क्योंकि कर्ण समाया था उसमे

और दोनों ही मारे गए रण में।

अरे! सोचिए जरा सुरपति के बारे में कि क्या बीती होगी उनके अपने मन पर 

पता लगा होगा उन्हें भी कि समर में कौन बड़ा था ?

उनका अपना सुत या फिर यह सूत ।




द्रोण की तरह मन में भरिए

पितामह की तरह सम्मान करिए 

गोविंद के जैसा ही देवत्व मानिए

दानी बड़ा था , काल था पांडवो का यह भी जानिए।

                                                               



                                                                  ~ अनंत

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