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  पार्थ या कर्ण? "हरी के सम्मुख भी ना हर जिसकी निष्ठा ने मानी धन्य - धन्य! राधेय बंधुता के अद्भुत अभिमानी" भगवान उवाच - "रुके क्यों हो पार्थ उठाओ गांडीव और सर भेद दो इस अतुल धनुर्धर का।" -"परन्तु गोविंद यह तो अधर्म है । कर्ण निहत्था है और मेरा उस पर वार करना क्षत्रियता के खिलाफ है।" "मरा तो अभिमन्यु भी अधर्म से ही था, और तुम धर्म की बात दुर्योधन की सेना से कर रहे हो?" अर्जुन की गांडीव आज फूले ना समा रही होगी।शायद कर्ण की काया ही उसका अंतिम स्वप्न होगा जो आज संपन्न हुआ। शायद सूर्य भी सरकर घन में छीप गए होंगे । शायद महाराज श्री कृष्ण मन में स्वयं विलाप कर रहे होंगे।शायद दुर्योधन के अश्रु भी निकले होंगे । शायद धर्मराज निष्ठा की सम्मान कर रही होंगे। भू का विजेता मिट्टी छोड़ चुका है,अब कौन उन सूत पुत्रो को समाज में सम्मान दिलवाएगा , कौन दीनो का स्वामी बनेगा,कौन दान~धर्म का अभिमानी बनेगा ,कौन प्रण के पालन हेतु प्राण देगा,भला कौन अपना कवच और कुंडल देगा? क्या छल से उस वीर को मारा जाना सही है ? जिसने कुटिल समाज के विष को पिया,जिसने अपने वचन के लिए दिनमणि ...